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मातृभाषा शिक्षा और तोलोंग सिकि (लिपि)

Submitted by admin on Wed, 09/22/2021 - 09:48

झारखण्ड अलग प्रांत आन्दोलन के दौरान छात्र नेताओं एवं शिक्षाविदों के बीच झारखण्ड की भाषा–संस्कृति को बचाये रखने के विषय पर बातें अकसरहां उठती रहती थीं और यह भी कहा जाता था कि किसी भी संस्कृति को बचाने के लिए उसकी भाषा को बचाना आवश्यक है और भाषा को बचाने के लिए उस भाषा का पठन–पाठन भी आवश्य्क है। परन्तु झारखण्ड राज्ये गठन के बाद समाज के आंदोलनकारी इस विषय पर गंभीर नहीं हो पाये।

लिपि चिह्नों का चुनाव

Submitted by admin on Tue, 09/21/2021 - 16:01

‘‘ब्रह्माण्ड में पृथ्वी कृत्रिम घड़ी की विपरीत दिशा Anticlockwise में सूर्य की परिक्रमा करती है। जिसके चलते सभी प्राकृतिक चीजें इससे प्रभावित होती है। जैसे- ‘‘बीज के अंकुरन के पष्चात् एक लता किसी आधार पर घड़ी की विपरीत दिषा (Anticlockwise Direction) में ही उपर चढ़ती है’’। ‘‘इसे आदिवासियों ने प्रकृति को, देखकर सीखा और अपने सभी क्रिया-कलापों, पूजा-पाठ, नेग-अनुष्ठान आदि (जन्म से मृत्यु तक) घड़ी की विपरीत दिषा (Anticlockwise) में सम्पन्न करना आरंभ किया किन्तु मृत्यु संस्कार घड़ी की दिषा (Clockwise Direction) में तथा बाँये हाथ से किया जाने लगा।’’ 

तोलोङ सिकि के विकास की रूपरेखा

Submitted by admin on Tue, 09/21/2021 - 15:55

कहा जाता है - ‘‘ आवश्‍यकता आविष्कार की जननी है।’’ इस कहावत को एक बार फिर डा नारायण उराँव ‘‘सैन्दा’’ ने चरितार्थ किया है। पेशे से चिकित्सक डा उराँव एक कुँडु़ख़ (उराँव) गाँव के रहने वाले एक अत्यंत साधारण किसान के बेटे हैं। उनके पिता का नाम स्व भुनेश्‍वर उराँव तथा माता का नाम श्रीमती फूलमनी उराँव है। उनका पैतृक निवास झारखण्ड राज्य (भारत) के गुमला जिला, सिसई थाना के अन्तर्गत ‘‘सैन्दा’’ ग्राम है। उनकी शिक्षा-दीक्षा पाँचवीं कक्षा तक गाँव के स्कूल में हुई तथा मैट्रिक की परीक्षा वर्ष 1979 में प्रखण्ड मुख्यालय सिसई के संत तुलसीदास उच्च विद्यालय, सिसई, (गुमला) से पूरी हुई।

झारखण्ड मे आदिवासी भाषाओं की दशा

Submitted by admin on Tue, 09/21/2021 - 15:47

सर्वेक्षण में यह तथ्य सामने आया है कि पूर्व में विष्व में लगभग 16000 (सोलह हजार) भाषाएँ बोली जाती थीं जिनमें से अब लगभग 6000 (छः हजार) ही रह गई है। यानि लगभग 10000 (दस हजार) भाषाएँ कालान्तर में विलुप्त हो गई। (साभार - हिन्दी दैनिक, जनसत्ता दिनांक 23.05.1997)

आदिवासी परम्परा में जन स्वास्थ्य की अवधारणा

Submitted by admin on Tue, 09/21/2021 - 15:44

साधारणतया राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की स्वास्थ्य परिचर्चाओं में जनजातीय स्वास्थ्य एक महत्वपूर्ण विषय हुआ करता है। इन परिचर्चाओं में - 1. स्वच्छ पेयजल 2. कुपोषण 3. सुरक्षित प्रसव 4. नशापान 5. गरीबी 6. अशिक्षा आदि विषय मुख्य रूप से हुआ करते हैं। क्या, ये विषय आदिवासी समाज में चिकित्सा विज्ञान के विकास के बाद आया ? क्या, ये प्रश्‍न पूर्व के आदिवासी समाज में नहीं था ?