WriteUps

‘कुँड़ुख़ व्याकरण की पारिभाषिक शब्दावली‘ विषयक एक दिवसीय कार्यशाला सम्पन्न

Submitted by admin on Sat, 06/04/2022 - 12:05

दिनांक 01 मई 2022, दिन रविवार को आदिवासी उराँव समाज समिति, बिरसा नगर, जोन न०-6, जमशेदपुर में ‘‘कुँड़ुख़ व्याकरण की पारिभाषिक शब्दावली‘‘ विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला सम्पन्न हुआ। यह कार्यशाला, टाटा स्टील फाउण्डेशन, जमशेदपुर के तकनीकि सहयोग से संचालित ‘‘कुँड़ुख़ (उराँव) भाषा एवं लिपि शिक्षण कार्यक्रम‘‘ का अग्रेतर क्रियान्वयन था। इस कार्यशाला में आदिवासी उराँव समाज समिति, बिरसा नगर के पदधारी सहित माध्यामिक विद्यालय के छात्रगण एवं कालेज के छात्र उपस्थित थे। कार्यशाला का शुभारंभ समिति के अध्यक्ष श्री बुधराम खलखो के आशीर्वचन से हुआ।

कुंड़ुख़ भाषा में पहेलियों का प्रयोग

Submitted by admin on Sat, 10/09/2021 - 12:23

कुंड़ुख़ भाषा में पहेलियों का प्रयोग बखुबी होता है। बच्चों के लिए यह बौदि्धक एवं भाषा विकास का एक अनोखा तरीका है जिसे समाज में बच्चों को सिखलाया जाता है। आइये इसे जाने :–

कुंड़ुख़ भाषा में मुहावरा एवं कहावत का प्रयोग

Submitted by admin on Thu, 10/07/2021 - 21:42

कुंड़ुख़ भाषा में मुहावरा एवं कहावत का प्रयोग बखुबी होता है। कई असहज बातों को इससे आसानी से समझा जाता है। आइये इसे जाने :–

बेनामी आदिवासी आस्था-धर्म की व्यथा

Submitted by admin on Tue, 09/21/2021 - 16:00

दिनांक 06.01.2011 को एक हिन्दी दैनिक में खबर छपी - ‘‘आदिवासी ही देश के असली नागरिक हैं।’’ खबर पढ़कर मन को सांतावना मिला कि - कोर्इ तो है जो भारत के आदिवासियों की सुधि लेता है। आज भी कुछ लोग हैं जो आदिवासियों के पहचान के बारे में अपनी उर्जा खरच रहे हैं। समाचार में कहा गया है कि माननीय सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस मार्कण्डेय काटजू एवं जस्टिस ज्ञान सुधा मिश्रा की संयुक्त खण्डपीठ ने एक फैसले में पांडवों के गुरू द्रोणाचार्य को आदिवासी युवक एकलव्य के साथ घोर अन्याय करने का दोषी पाया है। यह आदिवासियों के साथ सहस्त्राब्दियों से चले आ रहे अत्याचार का शास्त्रीय उदाहरण है।

आदिवासी परम्परा में अध्यात्मिक अवधारणा

Submitted by admin on Tue, 09/21/2021 - 15:00

साधरणतया, लोग कहा करते हैं - आदिवासियों का कोर्इ धर्म नहीं है। इनका कोर्इ आध्यात्मिक चिंतन नहीं है। इनका विश्‍वास एवं धर्म अपरिभाषित है। ये पेड़-पोधों की पूजा करते हैं ...... आदि, आदि। इस तरह के प्रश्‍नों एवं शंकाओं को प्रोत्साहित करने वालों से अगर पूछा जाय - क्या, वे अपने विश्‍वास, धर्म आदि के बारे में जानते और समझते हैं ? यदि इस तरह के प्रश्‍न करने वाले सचमुच अपने विश्‍वास, धर्म के बारे में जानते हैं, तो उनके द्वारा आदिवासियों के बारे में इस तरह के लांक्षण लगाये जाने हा औचित्य नहीं है और यदि उन्हें अपने बारे में पूरी जानकारी नहीं रखते है तो उन्हें समझाया जाना भी आसान नहीं है।