मातृभाषा शिक्षा और तोलोंग सिकि (लिपि)

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झारखण्ड अलग प्रांत आन्दोलन के दौरान छात्र नेताओं एवं शिक्षाविदों के बीच झारखण्ड की भाषा–संस्कृति को बचाये रखने के विषय पर बातें अकसरहां उठती रहती थीं और यह भी कहा जाता था कि किसी भी संस्कृति को बचाने के लिए उसकी भाषा को बचाना आवश्यक है और भाषा को बचाने के लिए उस भाषा का पठन–पाठन भी आवश्य्क है। परन्तु झारखण्ड राज्ये गठन के बाद समाज के आंदोलनकारी इस विषय पर गंभीर नहीं हो पाये।

पूर्ववर्ती बिहार सरकार में 13 अगस्त 1953 को एक निर्णय लिया गया‚ जिसमें कहा गया कि वैसे क्षेत्र जहाँ सिर्फ आदिवासी भाषा बोली जाती हैं वहाँ प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा के माध्यम से हो। इसी विचारधारा के साथ बिहार सरकार ने 20.12.1956 को Medium of Instruction in junior classes के संबंध में विभागीय अधिसूचना जारी किया। इसके लिए Medium of Instruction अर्थात शिक्षा का माध्यम के लिए मातृभाषा शिक्षा नियमावली प्रारूप तैयार हुआ। इस नियमावली में मातृभाषा के रूप में पूरे बिहार प्रदेश में हिन्दी, बंगला, ओड़िया, उर्दू, मैथिली, संताली, उराँव, हो, मुण्डारी एवं एंग्लो-इंडियन के लिए अंगरेजी भाषा (कुल 10)  को माध्यम बनाये जाने की अनुशंसा हुई। इस विषय पर कई अधिसूचनाएँ जारी भी हुई, पर यह योजना पूर्ववर्ती बिहार में पूर्ण रूप से लागू नहीं हो पायी।

मातृभाषा शिक्षा के संबंध में शिक्षाविदों का मानना है कि एक बच्चाू अपने माता-पिता एवं परिवार-समाज में रहकर 5 – 7 वर्षों के अन्दार अपनी मातृभाषा के माध्य-म से बहुत सारा ज्ञान भंडार विकसित कर लेता है, परन्तु  जैसे ही वह आधुनिक पाठशाला के प्रथम कक्षा में प्रवेश करता है उसे दूसरी भाषा के माध्य्म से उन्हींठ चीजों को सिखलाया जाता है और समाज से मिला हुआ उसका ज्ञान भंडार शून्य हो जाता है। ऐसी स्थिति में उसके मन में शुरू होती है उसकी मानसिक कुण्ठा और यहीं से शुरू होता है मानसिक विकार तथा School dropout. वास्तविकता यह है कि – लोग उर्जा के संरक्षण का सिद्धांत को सिर्फ पदार्थ या वस्तु के लिए व्यवहार करते हैं, जबकि मानवीय उर्जा का संरक्षण की बात कोई नहीं करता है। मातृभाषा में शिक्षा का माध्यम का तात्पर्य वैसे गैर हिन्दी या गैर अंगरेजी बच्चों के लिए है जो अपनी मातृभाषा के माध्यम से हिन्दी और अंगरेजी तक पहूँचेंगे। वर्तमान राष्रीसे य शिक्षा नीति 2020 में मातृभाषा के माध्यगम से प्राथमिक शिक्षा दिये जाने का प्रावधान उन बच्चों के लिए बेहतर होगा। 

झारखण्डऔ राज्या गठन के बाद राज्य  के नीति निर्धारकों का ध्या न इस ओर हुआ भी और वर्ष 2001 में स्कूनली शिक्षा कार्यक्रम में एक नया पाठ्यक्रम तैयार हुआ, जिसके अनुसार हिन्दी1 एवं अंगरेजी दो भाषा को प्रथम कक्षा से लागू किया गया तथा तीसरी भाषा के रूप में ऐच्छिअ‍क भाषा विषय का चुनाव करने का प्रावधान तैयार किया गया, जो पूर्ववर्ती बिहार के पाठ्यक्रम से मातृभाषा शिक्षा के मामले में बेहतर अवसर था। इसी तरह मानव संसाधन विकास विभाग, झारखण्डा सरकार का संकल्पथ सं0 1278 दिनांक 04 जून 2003 के माध्याम से सरकार का निर्णय सामने आया। इसमें कहा गया कि – राज्या सरकार ने निर्णय लिया है कि झारखण्डन की भागौलिक सीमा है, बहु भाषा–भाषी क्षेत्रों में उनकी जनसंख्याध के पर्याप्तोंआ के आधार पर प्रारंभिक शिक्षण के क्षेत्र में वर्ग 1 से चिन्हित स्थाकन विशेष में हिन्दी‍ राष्र्र भाषा के अतिरिक्ते, मातृभाषा के रूप में, वर्ग एक से हिन्दीम, बंगला, उड़ि‍या, उर्दू, संथाली, उरांव (कुंड़ुख़), हो, मुण्डांरी, खड़ि‍या, खोरठा, कुरमाली तथा एंग्लोक इंडियन के लिए अंगरेजी भाषा के माध्य,म से मातृभाषा के रूप में प्रारंभिक शिक्षण कार्य कराने की अनुमति दी जाए। इनमें से जिन मातृभाषाओं की अपनी लिपि नहीं है, उनकी लिपि के रूप में देवनागरी लिपि की मान्येता दी जाए। इस संबंध में कार्मिक, प्रशासनिक एवं राजभाषा विभाग, झारखण्ड  सरकार, रांची के पत्रांक 129 दिनांक 18.09.2003 के माध्यिम से कहा गया है कि संताली भाषा की लिपि ओल चिकि, हो भाषा की लिपि वरांग चिति तथा उरांव (कु्ंड़ुख़) भाषा की लिपि तोलोंग सिकि है। उक्तभ के आलोक में सामाजिक मांग पर झारखण्डं अधिविद्य परिषद, रांची द्वारा विज्ञप्ति संख्याक – 17/2009 के माध्यडम से एक विद्यालय के छात्रों को मैट्ि्ञक में कुंड़ुख़ भाषा विषय को तोलोंग सिकि (लिपि) में परीक्षा लिखने की अनुमति दी गई। उसके बाद झारखण्डो अधिविद्य परिषद, रांची के अधिसूचना, ज्ञापांक : JAC/गुमला/16095/12-0607/16 दिनांक 12.02.2016 के माध्यAम से कुंड़ुख़ भाषा की परीक्षा तोलोंग सिकि लिपि में परीक्षा लिखने की अनुमति वार्षिक परीक्षा 2016 से प्रदान की गई है। अब बारी समाज के लोगों की है कि वे इसे आने वाली पीढ़ी तक आगे ले जाने में अपनी भूमिका किस तरह निभा पाते हैंॽ
अधिसूचना की छायाप्रति जनमानस के अवलोकनार्थ प्रस्तुत –

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आलेख –
डॉ. नारायण उराँव ‘सैन्दा’, गुमला।
डॉ. बिन्दु  पहान, बिरसा नगर, जमशेदपुर।

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