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आदिवासी परम्परा में अध्यात्मिक अवधारना

- डॉ0 नारायण उराँव ‘‘सैन्दा’’

साधरणतया, लोग कहा करते हैं – आदिवासियों का कोर्इ धर्म नहीं है। इनका कोर्इ आध्यात्मिक चिंतन नहीं है। इनका विश्‍वास एवं धर्म अपरिभाषित है। ये पेड़-पोधों की पूजा करते हैं …… आदि, आदि। इस तरह के प्रश्‍नों एवं शंकाओं को प्रोत्साहित करने वालों से अगर पूछा जाय – क्या, वे अपने विश्‍वास, धर्म आदि के बारे में जानते और समझते हैं ? यदि इस तरह के प्रश्‍न करने वाले सचमुच अपने विश्‍वास, धर्म के बारे में जानते हैं, तो उनके द्वारा आदिवासियों के बारे में इस तरह के लांक्षण लगाये जाने हा औचित्य नहीं है और यदि उन्हें अपने बारे में पूरी जानकारी नहीं रखते है तो उन्हें समझाया जाना भी आसान नहीं है।
वैसे अध्यात्म एक गूढ़ विषय है जिसकी गहरार्इ तक कुछ ही लोग पहुँच पाते हैं। मुझे अध्यात्म पर तनिक भी जानकारी नहीं है फिर भी प्रस्तुत शीर्षक के माध्यम से आदिवासियों पर हो रहे वौद्धिक और वैचारिक अवमूल्यन के प्रति लोगों का ध्यानाकृष्ट करने का मेरा छोटा सा प्रयास है। ध्यातव्य हो कि आदिवासी परम्परा में भी अध्यात्म की सारी बातें थीं और हैं, किन्तु सरसरी नजर से देखने पर पेड़-पौधा नजर आता है। अध्यात्मिक अवधरना में सबसे अधिक जरूरी है र्इश्‍वर की परिकल्पना एवं मान्यता। दूसरा महत्वपूर्ण अवयव है आत्मा या अन्तर्रात्मा। विद्वत्तजनों का कहना है कि आत्मा का परमात्मा के साथ आत्मिक संबंध जोड़ना ही अध्यात्मिकता का सार है। इस परिपेक्ष्य में प्रश्‍न उठता है – क्या, आदिवासी विश्‍वास, धर्म में र्इश्‍वर की परिकल्पना है अथवा नहीं ? उसी तरह आत्मा के संबंध में आदिवासियों की मान्यता किस प्रकार है ? इन तथ्यों को समझने के लिए परम्परागत उराँव (कुँड़ुख़) आदिवासी समाज में प्रचलित अनुष्ठानों एवं अवधारनाओं पर गौर किया जाना चाहिए तथा कुँड़ुख़ (उराँव) भाषा की निम्नांकित शब्दावली पर मनन-चिंतन किया जाना चाहिए -
1. धरमे :- एका सवंग सँवसेन धर’र्इ आ:दिम धरमे अरा एका सवंग धरना जो:गे रर्अ्इ आ:दिम धरमे. (धरमे यानि र्इश्‍वर वह शक्ति जो सम्पूर्ण सृष्टि को पकड़े हुए है तथा वह शक्ति जो अनुशरण करने योग्य है)।
2. धरती अयंग :- धरती अयंग, धरती माता।
3. धरमी सवंग :- धरमे सवंग तरती चाजरका नेम्हा सवंग। र्इश्‍वरीय शक्तिाँ।
4. मय्हदेव :- मया ननु (दया करने वाला) देव, मय्हा (दयालु) देव।
5. परबर्इत :- परबस्ती ननु (पोषन-पालन करने वाली) मया (माया)।
6. चन्नदो-बी:ड़ी :- प्रकृति में सूर्य, उर्जा का शाश्‍वत श्रोत है।
7. करम देव :- करम पूजा में, करम का देव स्वरूप की पूजा होती है। कहीं भी हे करम पेड़ कहकर पूजा नहीे होती है।
8. चा:ला अयंग – चाल चिअ्उ अयंग। सरहुल के दिन पेड़ की छाया में तथा पेड़ की ओर रूख कर पूजा होती है किन्तु आह्वान् एवं मंत्रोचारण में किसी पेड़ के नाम से पूजा नहीं होती है। वहाँ पर धरमे एवं धरमी सवंग अर्थात र्इश्‍वर एवं र्इश्‍वरीय शक्तियों की पूजा होती है।
9. देवी :- दव ननु मे:द मलका मुक्का छाव नु संगरा चिअ्उ सवंग (मानवीय शरीर बिना ही महिला रूप में अच्छार्इ करने वाली शक्ति स्वरूपा।)
10. देवी अयंग :- पद्दा ता दव ननु अयंग।
11. देव :- दव ननु मे:द मलका मे:त छाव नु संगरा चिअ्उ सवंग (मानवीय शरीर बिना ही पुरूष रूप में अच्छार्इ करने वाली शक्ति)।
12. पचबालर :- पूर्वज। कुँड़ुख़ परम्परा में मृत्यु के पश्‍चात् शरीर को दफना/जला दिया जाता है तथा उनके रूह को ए:ख़ मंक्खना (छाया भितराना) अनुष्ठान कर घर में स्थान दिया जाता है और विभिन्न अवसरों पर उनके नाम से तर्पन एवं भोग दिया जाता है। उराँव लोगों की मान्यता है कि र्इश्‍वर एवं उनके पूर्वज हमेशा उनकी मदद एवं देखभाल करते हैं।
13. जिया (हाँस) :- आत्मा, अन्तर्रात्मा। जिया दिम उंग्गी अरा जिया दिम पुल्ली। कुँड़ुख़ परम्परा में धरमें सवंग (सर्वशक्तिमान र्इश्‍वर) एवं जिया सवंग (अन्तर्रात्मा) सिर्फ इन्ही दो तत्वों को उंग्गु यानि सामर्थ्यवान कहा गया है।
14. नाद :- नठाबअ्उ अरा दुक्खे चिअ्उ सवंग (विनाश करने वाली या दु:ख देने वाली जीवात्मा)। कुँड़ुख़ जीवन में कुछ लोग अपने हिस्से की सम्पत्ति से अधिक सम्पत्ति और ताकत अर्जित करने के लिए जीवात्मा/भटकती आत्मा की साधना कर अपने स्वार्थ के लिए उपयोग करते हैं।
15. पद्दा :- गाँव। एकअम आ:लर ही पा:दा अड्डा दिम पद्दा तली।
16. एड़पा :- घर। एकदद तंगहय उला इड़’र्इ अरा ओहारी ननी।
17. लूरएड़पा :- लूर गे र्इड़’उ एड़पा।
18. अखड़ा :- अख़ना + खटना + अड्डा (खटअर अख़ना अड्डा/शारीरिक श्रम कर ज्ञान सीखने का स्थल तथा निर्णय करने का स्थल)।
19. धुमकुड़िया :- धुम-धुम कुड़िया। धुम-धुम नलना बे:चना अख़ना अड्डा (अनुशासित तरीके से जीवन जीने के लिए आवश्यक ज्ञान सीखने का स्थान), कुड़िया का अर्थ छोटा सा घर या केन्द्र अथवा सेन्टर होता है। दूसरी ओर गांव के बुजुर्ग धम्म-धुम नाचना-गाना को अनुशासनहीन तरीके से कार्य करना एवं सीखना समझते हैं तथा इसकी वर्जना एवं भर्त्सना किया करते हैं।)
20. पड़हा :- पड़ा (गाँव का समूह क्षेत्र) नु पा:ड़ा अरा पड़ा नुम पड़गरआ। इसका कार्य खून एवं वंश की शुद्धता एवं सुरक्षा।
21. बिसु सेन्दरा – कर्इ पडहा मिलकर बिसु सेन्दरा का आयोजित किया करते हैं।
22. कुड़ुख़ :- कुड़ना + अख़ना ती कुड़ुख़ मंज्जा। (ओ:रे नु कुड़ना-मो:खना अख़’उर कुड़ख़र बा:तारर अरा आ:रिम नन्नारिन हूँ सिखाबा:चर। कुड़ना-मो:ख़ना अख़कत ख़ने कुँड़ख़त, कुड़ना-मो:ख़ना अक्खर ख़ने कुँड़ख़र, कुड़ना-मो:ख़ना अख़कन ख़ने कुँड़ख़न, कुड़ना-मो:ख़ना अख़कम ख़ने कुँड़ख़म, कुड़ना-मो:ख़ना अख़कय ख़ने कुँड़ख़य। (आदिकाल में किसी जंगल में सूखे बाँस के आपसी घर्षण से चीं……चीं……- चीं……चीं….. की आवाज निकलते-निकलते… जो अद्भ्ाूद दृश्य (दावानल) नजर आया वह कु़ड़ुख़ भाषा में चीं… चीं… से चिच्च (अग्नि) कहलाया और जो अवशेष बचा वह चिन्द (राख) कहलाया। वह चिच्च से पूरा जंगल जलने लगा और पशु-पक्षी मरने लगे। चीं… चीं… से चिच्च कहने वाले लोग उन अधजले मांस को खाये और बाद में जानवरों के कच्चे मांस को आग में सेंककर खाने की विधि की खोज की तथा दूसरे समूह को भी सिखलाया। इस समूह द्वारा आग एवं आग में सेंककर खाने की विधि की खोज ने पूरे मानव समाज के जीने का तरीका बदल दिया और उनकी भाषा में वे कुड़ा अख़’उ यथा कुड़ा मो:ख़ा अख़’उ से कुड़ुख़ कहलाये। आशय है, कुड़ुख़ पुरखे, आग एवं आग में कच्चे मांस को सेंक कर खाने की विधि की खोज किये और उन्हीं के द्वारा दूसरे लोगों तक पहूँचा। इस तथ्य को व्यवहार में रखने हेतु कुँड़ख़ पुरखों ने डण्डा कट्टना अनुष्ठान में र्इश्‍वर के नाम से समर्पित चढ़ावे यानि अण्डा को आग में तपाकर (अतख़ा नु कुड़अर) उपस्थित पुरूषों के लिए प्रसाद स्वरूप वितरण किया जाता है।)
23. उराँव :- उयुर + गण – उरागण – उरागण ठाकुर / उयुर + आँव – उराँव (हल चलाने वाले, खेती-बारी करने वालों का समूह।) उर + आँव – उराँव / उरबस गही आँवा ती बछरका (र्इश्‍वर की अग्नि वर्षा से बचे हुए) आ:लर।
24. ओलगी :- ओंग्गनन लग्गना। कुँड़ुख़ संस्कृति में अभिवादन करते समय दोनों हाथ जोड़कर सिर नवाते हुए ओलगी कहा जाता है या बाँया हाथ से दाहिना हाथ को केहुनि से थोड़ा नीचे स्पर्श करते हुए दाहिना हाथ को उठाकर शीश नवाते हुए ओलगी कहा जाता है। ओलगी का शाब्दिक अर्थ ओंग्गनन लग्गना अर्थात सामने वाले व्यक्ति के अन्दर के सामर्थ्यवान को नमन करना। कुँड़ुख़ अध्यात्म एवं विश्‍वास में उंग्गु सवंग दो शक्ति को माना गया है – 1. सर्वशक्तिमान र्इश्‍वर 2. अन्तर्रात्मा। अभिवादन करते समय सामने वाले व्यक्ति के अन्तर्रात्मा को नमन किया जाता है।
25. सा:रना :- एम्मबा सा:रना, की:ड़ा सा:रना, उम्हें सा:रना – महसूश करना, आत्मसात करना, जव मिमस – तमंसपेमकण्
26. सरना :- सिरजनन रम्फ ननु आ:लोन सा:रना दिम सरना/सरनन सा:रना दिम सरना। सरना समाज। सरना स्थल। सरना माँ। ……आदि।
इस तरह यह तथ्य है कि आदिवासियों की अपनी सभ्यता, संस्कृति, रीति-रिवाज, परम्परा, धर्म, अनुष्ठान इत्यादि सभी चीजें हैं। जरूरत है इसे समझने और आत्मसात करने की। र्इश्‍वर एवं र्इश्‍वरीय शक्तियाँ सबके लिए एक समान है। आवश्यकता है एक अच्छा पात्र बनकर अपनी अन्तर्रात्मा को परमात्मा के साथ संबंध स्थापित करने की। एक सच्चा आदिवासी इस संबंध को स्थापित करने के लिए अपने कार्य को र्इश्‍वर का कार्य समझकर र्इमानदारी एवं निष्ठा पूर्वक करने का प्रयास करता है। अध्यात्म का दरवाजा भी यहीं से खुलता है। अध्यात्म, व्यक्ति को र्इमानदार, नीतिवान, नैतिकवान और चरित्रवान बनाता है जिसकी आवश्यकता समाज को है।

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