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लिपि चिह्नों का चुनाव
‘‘ब्रह्माण्ड में पृथ्वी कृत्रिम घड़ी की विपरीत दिशा Anticlockwise में सूर्य की परिक्रमा करती है। जिसके चलते सभी प्राकृतिक चीजें इससे प्रभावित होती है। जैसे- ‘‘बीज के अंकुरन के पष्चात् एक लता किसी आधार पर घड़ी की विपरीत दिषा (Anticlockwise Direction) में ही उपर चढ़ती है’’। ‘‘इसे आदिवासियों ने प्रकृति को, देखकर सीखा और अपने सभी क्रिया-कलापों, पूजा-पाठ, नेग-अनुष्ठान आदि (जन्म से मृत्यु तक) घड़ी की विपरीत दिषा (Anticlockwise) में सम्पन्न करना आरंभ किया किन्तु मृत्यु संस्कार घड़ी की दिषा (Clockwise Direction) में तथा बाँये हाथ से किया जाने लगा।’’ … Read entire article »
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तोलोङ सिकि के विकास की रूपरेखा
कहा जाता है – ‘‘ आवश्यकता आविष्कार की जननी है।’’ इस कहावत को एक बार फिर डा … Read more »
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तोलोङ सिकि के विकास की रूपरेखा
कहा जाता है – ‘‘ आवश्यकता आविष्कार की जननी है।’’ इस कहावत को एक बार फिर डा … Read more »
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तोलोङ सिकि के विकास की रूपरेखा
कहा जाता है – ‘‘ आवश्यकता आविष्कार की जननी है।’’ इस कहावत को एक बार फिर डा नारायण उराँव ‘‘सैन्दा’’ ने चरितार्थ किया है। पेशे से चिकित्सक डा उराँव एक कुँडु़ख़ (उराँव) गाँव के रहने वाले एक अत्यंत साधारण किसान के बेटे हैं। उनके पिता का नाम स्व भुनेश्वर उराँव तथा माता का नाम श्रीमती फूलमनी उराँव है। उनका पैतृक … Read entire article »