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लिपि चिह्नों का चुनाव

‘‘ब्रह्माण्ड में पृथ्वी कृत्रिम घड़ी की विपरीत दिशा Anticlockwise में सूर्य की परिक्रमा करती है। जिसके चलते सभी प्राकृतिक चीजें इससे प्रभावित होती है। जैसे- ‘‘बीज के अंकुरन के पष्चात् एक लता किसी आधार पर घड़ी की विपरीत दिषा (Anticlockwise Direction) में ही उपर चढ़ती है’’। ‘‘इसे आदिवासियों ने प्रकृति को, देखकर सीखा और अपने सभी क्रिया-कलापों, पूजा-पाठ, नेग-अनुष्ठान आदि (जन्म से मृत्यु तक) घड़ी की विपरीत दिषा (Anticlockwise) में सम्पन्न करना आरंभ किया किन्तु मृत्यु संस्कार घड़ी की दिषा (Clockwise Direction) में तथा बाँये हाथ से किया जाने लगा।’’

आदिवासियों का मानना है कि मृत्यु के पष्चात आत्मा, षरीर को छोड़ देती है और पूर्वजों के समूह (पचबालर) के साथ मिल जाती है। अतः आत्मा, त्यागे हुए मृत षरीर में पुनः प्रवेष न करे इसके लिए वे अनुष्ठान को घड़ी की दिषा में बाँये हाथ से सम्पन्न करते हैं। हल चलाते समय एक हलवाहा दाहिने हाथ से बाँये घुमते हुए फिर दाहिनी ओर आगे आँतर लेता है। आदिवासी अपनी भाषा में तीना-डेब्बा (दाहिना-बाँया/Right-Left) कहते हैं न कि बाँया-दाहिना ;Left-Right ‘‘ध्यातव्य हो कि विकसित सभ्यता संस्कृति में से इस्लाम धर्मावलम्बी हज का नमाज अदा करते समय पवित्र काबा (मक्का-मदीना) में घड़ी की विपरीत दिषा (Anti-clockwise) में सात बार परिक्रमा करते हैं।’’ ‘‘वहीं वैदिक संस्कृति (हिन्दू संस्कृति) में सभी अनुष्ठान घड़ी की दिषा (Clockwise) में सम्पन्न होते हैं।’’ ‘‘इसी प्रकार बौद्ध धर्मावलम्बी ‘‘काल चक्र पूजा’’ में ‘‘कालचक्र’’ की परिक्रमा घड़ी की दिषा (Clockwise) में ही सम्पन्न करते हैं।’’
इन्ही कारणों से वर्णमाला के निर्धारण में प्रथम एवं अधिकत्तर वर्णों को आदिवासी परम्परा के अनुकूल घड़ी की विपरीत दिषा में अनुक्रमित किया गया है।

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