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नई लिपि की आवश्‍यकता क्यों ?

वर्तमान समय, विज्ञान एवं तकनीकि विकास का समय है। इस तकनीकि विकास ने पूरे भूमण्डल को एक साथ पिरोया है जिसे ‘भूमण्डलीकरण’ कहा जाता है। इस भूमण्डलीकरण के चलते छोटी समूह की भाषा-संस्कृतियों पर जबर्दस्त असर पड़ा है, और ये अपनी प्राकृतिक मौत Natural Death की ओर बढ़ रही है।

अपने देश भारत में हम सभी रोजगार की खोज एंव टेक्नोलॉजी के उपभोग के चलते अंग्रेजी और हिन्दी भाषा की और दौड़ रहे हैं परिणामस्वरूप हमारी मातृभाषा सिमट गई और धीरे-धीरे अंतिम पड़ाव की ओर पहुँच रही है।

आदिवासी भाषाओं में से कुँड़ुख़ (उराँव) भाषा की प्रकृति हिन्दी एवं अंग्रेजी भाषा की प्रकृति से भिन्न है जिसके चलते देवनागरी लिपि या रोमन लिपि के माध्यम से कुँडु़ख़ भाषा की मूलता को बरकरार नहीं रखा जा सकता है। वर्तमान में हिन्दी और अँग्रेजी के माध्यम से साहित्य सृजन एवं पठन-पाठन का सिलसिला जारी है जिसके चलते पूरा समाज हिन्दी एवं अँग्रेजी की ओर दौड़ रहा है और उसकी अपनी मातृभाषा प्राकृतिक मौत की ओर जा रही है।

इन सभी चीजों से बचने एवं स्वयं को बचाने हेतु सामयिक प्रयोग आवष्यक है। तोलोङ सिकि इन परिस्थितियों से जूझने का अस्त्र है। अपने जीर्णषीर्ण अवस्था में पड़ी भाषा को अपनी लिपि की पहचान मिलते ही वह पूरी दूनियाँ में नेत्रग्राह्य हो जायेगा और उसकी अपनी पहचान बन जायेगी। संस्कृति का वाहक भाषा है अतः भाषा के विकास से संस्कृति का विकास भी स्वतः होने लगेगा। भाषा को रोजगार से जोड़ने पर समाज में स्फूर्ति आएगी और लोगों का इस ओर ध्यान आकृष्ट होगा। प्राथमिक षिक्षा मातृभाषा के माध्यम से होने पर उर्जा का संरक्षण होगा और इस मानवीय उर्जा के संरक्षण को हम अपने व्यक्तित्व विकास में लगा सेकेंगें।

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