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झारखण्ड मे आदिवासी भाषाओं की दशा

सर्वेक्षण में यह तथ्य सामने आया है कि पूर्व में विष्व में लगभग 16000 (सोलह हजार) भाषाएँ बोली जाती थीं जिनमें से अब लगभग 6000 (छः हजार) ही रह गई है। यानि लगभग 10000 (दस हजार) भाषाएँ कालान्तर में विलुप्त हो गई। (साभार – हिन्दी दैनिक, जनसत्ता दिनांक 23.05.1997)
भारत देष में लगभग 559 आदिवासी जातियाँ, अनुसूचित जनजाति की सूची में है (जनगणना रिपोर्ट 1981 के अनुसार) झारखण्ड राज्य में लगभग 30 आदिवासी जातियाँ अनुसूचित जनजाति की सूची में हैं उन 30 जनजातियों में से मात्र 5 जातियाँ की भाषा ही साहित्यिक दृष्टिकोण से प्रचलन में है तथा राँची विष्वविद्यालय, राँची में जिनकी आई0 ए0, बी0 ए0 एवं एम0 ए0 स्तर पर पढ़ाई-लिखाई चल रही है। क्या उन 30 में से 25 जातियोें की भाषाएँ पूर्व में नहीं थीं या थीं तो क्या हुई ? यह उन आदिवासियों के लिए चिन्ता का विषय है।

झारखण्ड में आदिवासी भाषा और लिपि के आन्दोलन का इतिहास
आदिवासी भाषा साहित्य के इतिहास में लिपि का आन्दोलन वर्षों पुराना है। सर्वप्रथम उड़िसा निवासी एवं संताली भाषी स्व0 पं0 रघुनाथ मुर्मू के द्वारा सन् 1934 ई0 में ओलचिकि नामक लिपि को संताली भाषा हेतु प्रस्तुत किया गया था। जिसे भारत सरकार द्वारा वर्ष 2005 में संविधान की आठवीं अनुसूची में षामिल कर लिया गया है।

इसी प्रकार ‘हो’ भाषा-भाषी स्व0 कोल लको बोदरा द्वारा ‘हो’ भाषा हेतु ‘वराङ चिति’ नामक लिपि को प्रस्तुत किया गया है जिसका प्रचलन समाज में होता है किन्तु इसका उपयोग किसी प्रकार का सरकारी आदेष से विद्यालयों में पठन-पाठन हेतु नहीं किया जा सका है।

कुँड़ुख़ भाषा-भाषियों द्वारा इस क्षेत्र में किए गये कार्यों की लम्बी श्रृंखला है। कुँड़ुख़ भाषी स्व0 सामुएल रंका ने सन् 1937 ई0 में ‘कुँड़ुख़ लिपि’ के नाम से एक वर्णमाला तैयार कर समाज एवं षासन के सम्मुख प्रस्तुत किया था, किन्तु उसे परिस्थिति के अनुकुल न पाकर छोड़ दिया गया। इसी क्रम में तमिल भाषी डाॅ0 श्रीमती अनन्ती जेबा सिंह द्वारा प्रस्तुत ‘‘बाराती (भारती) लिपि’’ को कुँड़ुख़ (उराँव) भाषा की लिपि के रूप में प्रस्तुत किया गया। कुँड़ुख़ भाषा के विकास में अभिरूचि रखने वाले समर्थक इसे विकसित करने हेतु आगे आये और वर्ष 1992 ई0 में कार्तिक उराँव महाविद्यालय, गुमला के प्रांगन में आयोजित ‘कुँड़ुख़ जतरा’ में इस पर परिचर्चा करायी गयी और पूर्व में किये गये कार्यों में से इसे विषिष्ट कार्य की श्रेणी में रखा गया, जिसका आगे विकास नहीं हो पाया। उसके बाद पेषे से चिकित्सक कुँड़ुख़भाषी डाॅ0 नारायण उराँव ‘सैन्दा’ द्वारा प्रस्तुत तोलोङ सिकि को ‘कुँड़ुख़ समाज’ द्वारा कुँड़ुख भाषा की लिपि के रूप में स्वीकार कर लिया गया तथा झारखण्ड अधिविद्य परिषद, राँची द्वारा दिनांक 19 फरवरी 2009 को विद्यालयों में पठन-पाठन हेतु इसके उपयोग की विज्ञप्ति जारी की गई। कुँड़ुख़ समुदाय भी वर्तमान में अपने पठन-पाठन में इसका प्रयोग कर रहा है और मैट्रिक स्तर पर कुँड़ुख़ विषय की परीक्षा में परीक्षार्थियों द्वारा उत्तर इसी लिपि में लिखे जा रहे हैं।

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