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तोलोङ सिकि के विकास की रूपरेखा

तोलोङ सिकि के विकास की रूपरेखा

कहा जाता है – ‘‘ आवश्‍यकता आविष्कार की जननी है।’’ इस कहावत को एक बार फिर डा नारायण उराँव ‘‘सैन्दा’’ ने चरितार्थ किया है। पेशे से चिकित्सक डा उराँव एक कुँडु़ख़ (उराँव) गाँव के रहने वाले एक अत्यंत साधारण किसान के बेटे हैं। उनके पिता का नाम स्व भुनेश्‍वर उराँव तथा माता का नाम श्रीमती फूलमनी उराँव है। उनका पैतृक निवास झारखण्ड राज्य (भारत) के गुमला जिला, सिसई थाना के अन्तर्गत ‘‘सैन्दा’’ ग्राम है। उनकी … Read entire article »

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नई लिपि की आवश्‍यकता क्यों ?

वर्तमान समय, विज्ञान एवं तकनीकि विकास का समय है। इस तकनीकि विकास ने पूरे भूमण्डल को एक साथ पिरोया है जिसे ‘भूमण्डलीकरण’ कहा जाता है। इस भूमण्डलीकरण के चलते छोटी समूह की भाषा-संस्कृतियों पर जबर्दस्त असर पड़ा है, और ये अपनी प्राकृतिक मौत Natural Death की ओर बढ़ रही है। … Read entire article »

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झारखण्ड मे आदिवासी भाषाओं की दशा

सर्वेक्षण में यह तथ्य सामने आया है कि पूर्व में विष्व में लगभग 16000 (सोलह हजार) भाषाएँ बोली जाती थीं जिनमें से अब लगभग 6000 (छः हजार) ही रह गई है। यानि लगभग 10000 (दस हजार) भाषाएँ कालान्तर में विलुप्त हो गई। (साभार – हिन्दी दैनिक, जनसत्ता दिनांक 23.05.1997) भारत देष में लगभग 559 आदिवासी जातियाँ, अनुसूचित जनजाति की सूची में है (जनगणना रिपोर्ट 1981 के अनुसार) झारखण्ड राज्य में लगभग 30 आदिवासी जातियाँ अनुसूचित जनजाति की सूची में हैं उन 30 जनजातियों में से मात्र 5 जातियाँ की भाषा ही साहित्यिक दृष्टिकोण से प्रचलन में है तथा राँची विष्वविद्यालय, राँची में जिनकी आई0 ए0, बी0 ए0 एवं एम0 ए0 स्तर पर पढ़ाई-लिखाई चल रही है। क्या उन 30 में से 25 जातियोें की भाषाएँ पूर्व में नहीं थीं या थीं … Read entire article »

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