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आदिवासी परम्परा में जन स्वास्थ्य की अवधारणा

आदिवासी परम्परा में जन स्वास्थ्य की अवधारणा

- डॉ0 नारायण उराँव ‘‘सैन्दा’’ साधारणतया राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की स्वास्थ्य परिचर्चाओं में जनजातीय स्वास्थ्य एक महत्वपूर्ण विषय हुआ करता है। इन परिचर्चाओं में – 1. स्वच्छ पेयजल 2. कुपोषण 3. सुरक्षित प्रसव 4. नशापान 5. गरीबी 6. अशिक्षा आदि विषय मुख्य रूप से हुआ करते हैं। क्या, ये विषय आदिवासी समाज में चिकित्सा विज्ञान के विकास के बाद आया ? क्या, ये प्रश्‍न पूर्व के आदिवासी समाज में नहीं था ? ये तमाम प्रश्‍न मानव … Read entire article »

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तोलोंग सिकि (लिपि) का संक्षिप्त इतिहास

तोलोंग सिकि (लिपि) का संक्षिप्त इतिहास

तोलोंग सिकि, भारतीय आदिवासी आन्दोलन एवं झारखण्ड का छात्र आन्दोलन की देन है। यह लिपि, आदिवासी भाषाओं की लिपि के रूप में विकसित हुर्इ है। इस लिपि को कुँड़ुख (उराँव)़ समाज एवं झारखण्ड सरकार ने कुँड़ुख़ भाषा की लिपि के रूप में मान्यता दी है तथा कार्मिक, प्रशासनिक सुधार एवं राजभाषा विभाग के पत्रांक 129 दिनांक 18.09.2003 द्वारा संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किये जाने हेतु अनुशंसित किया गया है। इससे वर्ष 2009 सत्र … Read entire article »

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लिपि चिह्नों का चुनाव

‘‘ब्रह्माण्ड में पृथ्वी कृत्रिम घड़ी की विपरीत दिशा Anticlockwise में सूर्य की परिक्रमा करती है। जिसके चलते सभी प्राकृतिक चीजें इससे प्रभावित होती है। जैसे- ‘‘बीज के अंकुरन के पष्चात् एक लता किसी आधार पर घड़ी की विपरीत दिषा (Anticlockwise Direction) में ही उपर चढ़ती है’’। ‘‘इसे आदिवासियों ने प्रकृति को, देखकर सीखा और अपने सभी क्रिया-कलापों, पूजा-पाठ, नेग-अनुष्ठान आदि (जन्म से मृत्यु तक) घड़ी की विपरीत दिषा (Anticlockwise) में सम्पन्न करना आरंभ किया किन्तु मृत्यु संस्कार घड़ी की दिषा (Clockwise Direction) में तथा बाँये हाथ से किया जाने लगा।’’ … Read entire article »

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